IMG-20260210-WA0001

भूमकाल दिवस 2026: बस्तर के जनजातीय वीरों की अमर गाथा

Spread the love

छत्तीसगढ़ आज अपने इतिहास के उस स्वर्णिम लेकिन बलिदान से भरे अध्याय को नमन कर रहा है, जिसने औपनिवेशिक सत्ता की नींव हिला दी थी। भूमकाल स्मृति दिवस के अवसर पर पूरे प्रदेश में शहीद गुंडाधूर और उनके साथियों के साहस, संघर्ष और आत्मबलिदान को श्रद्धापूर्वक याद किया जा रहा है। वर्ष 1910 में बस्तर की धरती से उठा “भूमकाल” का उद्घोष केवल एक विद्रोह नहीं था, बल्कि जल-जंगल-जमीन और स्वाभिमान की रक्षा के लिए जनजातीय समाज का संगठित प्रतिरोध था, जिसकी गूंज आज भी महसूस की जाती है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज 1910 का भूमकाल आंदोलन ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध भड़की वह चिंगारी था, जिसने पूरे बस्तर क्षेत्र को आंदोलित कर दिया। अंग्रेजी शासन द्वारा जंगलों पर कब्ज़ा, परंपरागत जीवनशैली में हस्तक्षेप, जबरन श्रम और कर वसूली ने जनजातीय समुदाय को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने पर मजबूर कर दिया। तत्कालीन शासक राजा प्रताप सिंह के अंग्रेजों के पक्ष में खड़े होने से असंतोष और गहरा गया। इसी दौर में नेटानार के युवा वीर गुंडाधूर और डेबरीधूर ने गोंड, मुरिया और हल्बा समाज के हजारों योद्धाओं को एकजुट किया। इमली के वृक्षों के नीचे गुप्त सभाएं हुईं, रणनीतियां बनीं और अंग्रेजी चौकियों पर तीर-कमान से सशक्त प्रतिरोध किया गया। यह संघर्ष 17 फरवरी 1910 तक चला, जिसमें सैकड़ों वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। भले ही यह विद्रोह सैन्य बल से दबा दिया गया, लेकिन इसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चेतना को नई दिशा दी।

आज भूमकाल दिवस केवल स्मृति नहीं, बल्कि जीवंत परंपरा के रूप में मनाया जाता है। 10 फरवरी से लेकर फरवरी के मध्य तक बस्तर अंचल के गांव-गांव में श्रद्धा और सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन होता है। जगदलपुर में मुख्य कार्यक्रम के तहत प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इमली पूजा के माध्यम से उन वृक्षों का स्मरण किया गया, जो संघर्ष के साक्षी रहे। नेटानार, सुकमा और आलनार जैसे क्षेत्रों में ग्रामदेवता जात्रा और पारंपरिक नृत्यों ने जनजातीय संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत की। वर्ष 2026 में सर्व जनजातीय समाज की बैठकों का आयोजन भी हुआ, हालांकि कुछ औद्योगिक संस्थानों से अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण मतभेद की स्थिति भी सामने आई। वहीं, कुछ संगठनों द्वारा इस ऐतिहासिक आंदोलन को वैचारिक रूप से जोड़ने के प्रयास भी चर्चा में रहे।

रायपुर से लगभग 300 किलोमीटर दूर स्थित बस्तर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा है। भूमकाल आंदोलन की विरासत आज भी पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय और स्थानीय अधिकारों के विमर्श को दिशा देती है। स्थानीय समाचार पोर्टलों पर भूमकाल दिवस से जुड़े कार्यक्रमों के लाइव अपडेट्स साझा किए गए, वहीं प्रशासन ने बस्तर मार्ग पर आवाजाही को लेकर सतर्कता भी बरतने की अपील की।

भूमकाल दिवस हमें यह याद दिलाता है कि इतिहास केवल बीते समय की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए चेतावनी और प्रेरणा दोनों होता है। शहीद गुंडाधूर और उनके साथियों का संघर्ष हमें सिखाता है कि जब समाज एकजुट होता है, तो सबसे बड़ी सत्ता भी चुनौती के सामने टिक नहीं पाती। जल-जंगल-जमीन की रक्षा, सांस्कृतिक पहचान और आत्मसम्मान के लिए दिया गया यह बलिदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
जय छत्तीसगढ़, जय बस्तर।

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *